भारतीय हॉकी टीम ने एक बार फिर से इतिहास लिखा| इकतालीस साल बाद ओलंपिक के सेमी-फाइनल्स में भारत ने जर्मनी को 5-4 से हराकर कांस्य पदक जीता| पिछली बार १९८० में मॉस्को में आयोजित ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था| यह भारतीय पुरुष हॉकी टीम का १२वाँ ओलंपिक पदक है, जो खेलों के इतिहास में सबसे अधिक है, परंतु १९८० में मिले स्वर्ण पदक के बाद पहला है|

लंदन २०१२ ओलंपिक में भारतीय टीम एक भी जीत दर्ज नहीं कर पाई थी| परंतु कुछ ही सालों में खिलाड़ियों ने अपने खेल को ऐसे सुधारा कि इस टीम ने आठ मैच में से छह मैच जीतकर सेमी-फाइनल्स में अपनी जगह बना ली| इससे पता चलता है कि भारतीय हॉकी टीम इससे बेहतर प्रदर्शन करने के सक्षम है|

ओलंपिक में कप्तान मनप्रीत सिंह और उनकी टीम ने खेल के दौरान मैदान में गेंद पर अपनी पकड़ बनाई रखी|

इस ओलंपिक में कप्तान मनप्रीत सिंह और उनकी टीम ने खेल के दौरान मैदान में गेंद पर अपनी पकड़ बनाई रखी| टीम ने  धैर्य के साथ अपने खेल का प्रदर्शन किया| इसके विपरीत, जर्मन खिलाड़ी आक्रमक हो रहे थे। | खेल को जीतने का दबाव उन पर भारी पड़ रहा था| उन्होंने भारतीय टीम पर दबाव बनाने की कोशिश की| परंतु जर्मनों की कोई भी रणनीति, टाइमर की खराबी आदि भारतीय खिलाड़ियों के हौसले को कम न कर सका|

अंततः भारतीय टीम ने जर्मनी को हराकर ऐतिहासिक जीत हासिल की| इस जीत के साथ भारतीय टीम ने सिर्फ जर्मनी पर ही विजय नहीं प्राप्त की बल्कि हर एक भारतीयों के दिलों पर भी विजय पाया है| आज गर्व के साथ हम भारतीय कह सकते हैं कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है|

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