तालिबान ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के पश्तून इलाकों में वादा किया था कि अगर एक बार उनको सत्ता मिल जाए तो वे सुरक्षा और शांति कायम करेंगे। वे इस्लाम के साधारण शरीया कानून को लागू करेंगे। हालांकि कुछ ही समय में तालिबान लोगों के लिए सिरदर्द साबित हुआ। शरीया कानून के तहत महिलाओं पर कई तरह की कड़ी पाबंदियाँ लगा दी गईं। सजा देने के विभिन्न और भयभीत तरीकों के कारण अफगानी समाज में इसका विरोध होने लगा|

१५ अगस्त को अफगानिस्तान का इतिहास एक पूरे चक्र में आ गया| अमेरिका द्वारा आतंकवाद के खिलाफ अपना वैश्विक युद्ध शुरू करने के लगभग २० साल बाद तालिबान ने काबुल पर फिर से पूरी तरह कब्जा कर लिया | लगभग ५० लाख लोगों की जनसंख्या वाले २६७ जिले बिना किसी लड़ाई के इस्लामी विद्रोहियों के हाथों में आ गया| अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गया| अमेरिकन दूत भी अपना दूतावास छोड़कर काबुल हवाई अड्डे के लिए रवाना हो गए|

तालिबान

यह अमेरिका के लिए एक शर्म की बात है क्योंकि उसने अफगानिस्तान के हर कोने में तालिबान को हराने का संकल्प लिया था| अफ़गानों के लिए यह एक त्रासदी  है क्योंकि इन्हें एक हत्यारे मिलिशिया की दया पर छोड़ दिया गया |

अफगानिस्तान से चिंताजनक खबरें आ रही हैं कि तालिबान जनता पर सख्त धार्मिक संहिता लागू कर रहे हैं और विरोध करने वालों के खिलाफ हिंसा कर रहे हैं| सन् १९६६ में जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया था, तब वहाँ की सरकार देश से भागी नहीं थी| अहमद शाह मसूद और बुरहानुद्दीन रब्बानी पंजशीर घाटी में छिप गए थे जहाँ उन्होंने उत्तरी गठबंधन को फिर से संगठित करके तालिबान के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी थी|

इस बार ना ही कोई उत्तरी गठबंधन बची है ना सरकार| कुछ इलाकों को छोड़कर, पूरा अफगानिस्तान अब तालिबान के कब्ज़े में है|

यदि वर्ष १९९० अफ़गानिस्तान के लोगों के जीवन में अंधकार लाया था तो इसबार उन्हें पिछली बार से कहीं ज्यादा त्रासद स्थितियों का सामना करना पड़ेगा| अब तो अल्लाह का भेजा हुआ कोई रहनुमा ही इस संकट से निकाल सकता है|

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