बात हो नारीवाद की या नारी सशक्तिकरण की दोनों ही आज कल के युग मे काफी प्रचलित हैं । जो भेदभाव या फिर किसी भी प्रकार का हनन , जो स्त्रियों का पहले होता था उसे रोकने के लिए नारीवाद और नारी सशक्तिकरण की आवश्यकता भी है । लेकिन एक आंकड़ा और भी है जो नारी सशक्तिकरण के बीच सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है , वो है जेंडर पे गैप ।

क्या है जेंडर पे गैप ?

आसान भाषा मे अगर कहा जाए तो जेंडर पे गैप का मतलब होता है , यदि एक ही काम स्री और पुरुष दोनों कर रहे हैं तो उन दोनों में से किसी एक को दूसरे के अपेक्षा समान काम के लिए कम पैसे दिए जाते हैं । अक्सर या कहें लगभग हर मामले में कम पैसे स्त्रियों को ही दिया जाता है । तो यह है जेंडर पे गैप ।


भारत मे भी जेंडर पे गैप के मामले चरम पर रहे हैं और बरक़रार है । कहीं न कहीं बहुत सारे क्षेत्र में एक पुरुष को स्त्रियों के मुकाबले अधिक पैसे मिलते हैं । 2019 में हुए एक सर्वे के मुताबिक स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले 19 प्रतिशत कम वेतन मिलता है । 2019 में किए गए एक सर्वे में मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स ( MSI ) ने पाया कि महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 19 प्रतिशत कम वेतन मिलता है । इसका अर्थ यह निकलता है कि पुरुष महिलाओं के तुलना में हर घंटे 46 रुपए और 19 पैसे अधिक कमाते हैं ।
2020 में जेंडर गैप इंडेक्स के अनुसार भारत 112वे स्थान पर फिसल गया है जबकि 2018 में भारत 108वे स्थान पर था । रिपोर्ट के अनुसार, राजनीति, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में अंतर को पाटने में भारत को लगभग 100 साल लगेंगे। अगर बात करें हम सिर्फ भारत की तो लड़कियों की जल्दी शादी , शादी के बाद जल्दी बच्चें , पढ़ने का असमान मौके इन सब कारणों से यह आंकड़ा और बढ़ जाता है । बहुत सी औरतें तो ऐसी भी होती हैं जो शादी या बच्चे हो जाने के बाद काम पर नही लौटती और एक ऐसा ही एक आंकड़ा देता है मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स का एक मत जिसके अनुसार 46% औरतों का मानना है की बच्चे हो जाने के बाद वे काम पर दोबारा नही लौट पाती ।


लोगों का रूढ़िवादी मानना एक यह भी है कि महिलाओं के नेतृत्व में प्रदर्शन अच्छा नही होता और जो महिलाएं अच्छी तरह से नेतृत्व करें उनकी संख्या घर के काम काज और अन्य जिम्मेदारियों के कारण कम है किंतु यह पूरी तरीके से भ्रमात्मक है । मॉन्स्टर डॉट कॉम ने एक सर्वेक्षण किया था जिसमे पता चलता है कि 60% कामकाजी महिलाओं को कार्यक्षेत्र पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है । एक तिहाई महिलाओं का मानना था कि उन्हें आसानी से किसी उच्च भूमिका निभाने के लिए नही देखा जाता । जितनी महिलाओं का सर्वेक्षण किया गया था उसमें से 86% महिलाएं काम का चुनाव करते समय सुरक्षा को एक कारक मानती हैं और उसमें से 50% रात की नौकरी और सुरक्षा के कारण नौकरी करने में हिचकिचाती भी हैं ।

Credits; Quartz


बॉलीवुड की भी कई अभिनेत्रियों ने भी जेंडर पे गैप का विरोध किया है । दीपिका पादुकोण और कंगना रनौत समेत 6 अभिनेत्रियों ने भी इसका विरोध किया है । दीपिका पादुकोण ने संजय लीला भंसाली की फ़िल्म बैजू बावरा से अपना नाम पीछे कर लिया क्योंकि उनको उनके पति रणवीर सिंह जितना ही मेहनताना देने से इनकार किया गया । वहीं हम अगर बात करें सोनम कपूर की तो उन्होंने कहा कि जेंडर पे गैप के कारण उन्होंने कई फिल्मों से हाथ धो लिया । उन्होंने कहा कि जेंडर जेंडर पे गैप बहुत ही बेकार है लेकिन वह हमेशा इसके खिलाफ खड़ी रहेंगी हां बहुत सारे रोल्स से उनको हाथ धोना पड़ा है लेकिन इसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

Credits: Forbes


सोनाक्षी सिन्हा ने 2017 कहा था कि “केवल एक चीज जो मैं बॉलीवुड में बदलने के बारे में सोच सकती थी, वह है जेंडर पे गैप क्योंकि आजकल अधिक से अधिक महिला केंद्रित फिल्में बनाई जा रही हैं।” उनका दृढ़ विश्वास है कि अगर एक फिल्म निर्माता एक महिला पर भरोसा दिखाता है और अगर वह निवेश पर रिटर्न लाती है, तो उसे उचित पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए।

Credits: Forbes


पुरुष प्रधान वाली फिल्में और महिला प्रधान वाली फिल्मों में बॉक्स आफिस पर होने वाले संग्रह के विषय मे बोलते हुए कटरीना कैफ कहती हैं किमहिला प्रधान फिल्मों को समान बजट और माउंटिंग दी जानी चाहिए, जैसा कि पुरुष को दिया जाता है।

Credits: Forbes


अपने हर बात को बेखौफ तरीके से कहने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत भी इस विषय पर ऐसा ही सोच रखती हैं अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि फ़िल्म उद्योग में ऐसी महिलाएं हैं जो मानती हैं कि महिलाएं सिनेमाघर में उतनी भीड़ नहीं खींच सकतीं जितना पुरुष कर सकते हैं। इसलिए उन्हें समान वेतन की मांग नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर हम अभिनेत्रियों के रूप में लड़कियों में यह हीन भावना पैदा करते रहें, तो बेहतर समय की कोई उम्मीद नहीं है।”

Credits: Forbes


द नेशनल बुलेटिन से बात करते हुए, तापसी ने कहा कि अगर कोई अभिनेत्री अधिक पैसे मांगती है, तो उसे “कठिन और समस्याग्रस्त” कहा जाता है। दूसरी ओर, यदि कोई पुरुष अभिनेता ऐसा ही करता है, तो “यह उसकी सफलता का प्रतीक है”। पन्नू ने आगे विस्तार से बताया कि जिन पुरुष अभिनेताओं ने उनके साथ ही करियर की शुरुआत की थी वे उससे 3 से 5 गुना अधिक कमाते हैं और जैसे-जैसे उच्च स्टार श्रेणी में जाते हैं, वेतन अंतर बढ़ता रहता है।

उम्मीद है कि यह दृष्टि और दृश्य दोनों ही बदलेगी ।

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